Ek Garam Chai talk with Sanskrit Scholar Dr. Promod
राष्ट्रपति बोले "बहुत अच्छा"
संस्कृत विद्वान डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा को मिला महर्षि बादरायण व्यास सम्मान
| Dr. Promod got award from President of India |
किसी भी क्षेत्र में जब मेहनत, लगन और जज्बे से काम किया जाए तो कार्य को पहचान जरूर मिलती है। ऐसे ही एक व्यक्तित्व रजत पथ निवासी डॉ प्रमोद कुमार शर्मा है, जिन्होंने अपने कार्यों से नई दिशा प्रदान की है। जगद्गुरू रामानन्दाचार्य विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संस्कृत के क्षेत्र में युवा प्रतिभा के रूप में महर्षि बादरायण व्यास सम्मान से सम्मानित किया है। एक गरम चाय के साथ उनसे खास बातचीत।
संस्कृत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान ?
मुझे यह पुरस्कार संस्कृत लेखन, प्रकाशन, पाण्डुलिपि प्रकाशन, संस्कृत व्याकरण रचना, संस्कृत के गं्रथों की रचना, संस्कृत के प्रचार प्रसार और छात्रों को निशुल्क अध्यापन के लिए दिया गया है। यह 40 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति को दिया जाता है।
पिता जी से मिली प्रेरणा ?
मेरे पिता रामनिवास शर्मा प्रारंभ से ही संस्कृत अध्यापन से जुड़े है। मेरे भाई और मैं जब छोटे थे तो स्कूल शिक्षा ले रहे थे। लेकिन मैं पिताजी की इच्छा अनुसार परंपरागत गुरूकुल में शिक्षा के लिए चला गया। वृंदावन और काशी में रहकर शिक्षा ग्रहण की। महर्षि कात्यायन, महर्षि पाणिनी और पतंजलि के व्याकरण का गहन अध्ययन किया। शुक्ल यजुर्वेद, सांख्य दर्शन और वेदान्त दर्शन का अध्ययन भी किया।
प्रमुख कृतियां ?
सांख्य कारिका की अशोक दास संस्कृत व्याख्या, शब्दार्थ व वृत्यर्थ हिन्दी सहित। लघु सिध्दान्त कौस्तुभ नामक पाण्डुलिपि का संपादन किया। पाणिनीय प्रवेशिका का प्रणयन कर प्रकाशित करवाया। 35 से अधिक संस्कृत शास्त्रीय निबंध और संस्कृतकात्य प्रतिष्ठित संस्कृत शोध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है।
फैमिली का रोल क्या है ?
मेरी वाइफ वनमाला अंग्रेजी की लेक्चरर है, पर संस्कृत के प्रचार प्रसार और अन्य कार्यों में मेरी बहुत मदद करती है। शादी के बाद उन्होंने मुझसे संस्कृत सीखी। मेरी दोनों बेटियां अंग्रेजी माध्यम स्कूल में है। उन्होंने वैकल्पिक विषय संस्कृत लिया है। वो आसानी से संस्कृत में बात कर लेती हैं।
निशुल्क अध्यापन ?
मैं प्रतिदिन सुबह 6 बजे से 9 बजे तक विद्यार्थियों को निशुल्क पढाता हूं। 8 साल से मैं निशुल्क अध्यापन कर रहा हूं। इसके अलावा काशी की गुरूकुल परंपरा मानसरोवर में भी बनाई हुई है। गुरूकल में विद्यार्थी परंपरागत गुरूकुल शिक्षा के अनुरूप रहते हैं व संस्कृत का अध्ययन करते है।
संस्कृत से जोडऩे के लिए इंटरनेट का उपयोग करते है ?
इंटरनेट के युग में किसी भी भाषा के विस्तार के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध्ता होनी जरूरी हैं। मेरे विद्यार्थी देश के अलग अलग हिस्सों से है, जिन्हें मैं इंटरनेट व दूरभाष के माध्यम से संस्कृत सीखाता हूं। इसके साथ ही मैं ऐसी तकनीक भी बनाने के प्रयास में हूं, जिससे सोशल साइटस के माध्यम से सरल सूत्रों से लोग संस्कृत को सीख सके। नवीन प्रयास से संस्कृत का सरल रूप इंटरनेट पर उपलबध हो जाएगा।
मातृभाषा के लिए संदेश ?
संस्कृत बहुत ही मधुर भाषा है, जो प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश देती है। हर रोज या सप्ताह में कम से कम एक बार तो संस्कृत अवश्य पढऩी चाहिए। किसी भी व्यक्ति से आप जो भी अच्छी बात सीख सकते हैं जरूर सीखें।
राष्ट्रपति से मुलाकात कैसी रही ?
जब मेरा नाम पुकारा गया और मैं उनके समीप पहुंचा तो उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया। उन्होंने कहा बहुत अच्छा। यह पल जिन्दगी का सबसे यादगार पल है।
संस्कृत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान ?
मुझे यह पुरस्कार संस्कृत लेखन, प्रकाशन, पाण्डुलिपि प्रकाशन, संस्कृत व्याकरण रचना, संस्कृत के गं्रथों की रचना, संस्कृत के प्रचार प्रसार और छात्रों को निशुल्क अध्यापन के लिए दिया गया है। यह 40 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति को दिया जाता है।
पिता जी से मिली प्रेरणा ?
मेरे पिता रामनिवास शर्मा प्रारंभ से ही संस्कृत अध्यापन से जुड़े है। मेरे भाई और मैं जब छोटे थे तो स्कूल शिक्षा ले रहे थे। लेकिन मैं पिताजी की इच्छा अनुसार परंपरागत गुरूकुल में शिक्षा के लिए चला गया। वृंदावन और काशी में रहकर शिक्षा ग्रहण की। महर्षि कात्यायन, महर्षि पाणिनी और पतंजलि के व्याकरण का गहन अध्ययन किया। शुक्ल यजुर्वेद, सांख्य दर्शन और वेदान्त दर्शन का अध्ययन भी किया।
प्रमुख कृतियां ?
सांख्य कारिका की अशोक दास संस्कृत व्याख्या, शब्दार्थ व वृत्यर्थ हिन्दी सहित। लघु सिध्दान्त कौस्तुभ नामक पाण्डुलिपि का संपादन किया। पाणिनीय प्रवेशिका का प्रणयन कर प्रकाशित करवाया। 35 से अधिक संस्कृत शास्त्रीय निबंध और संस्कृतकात्य प्रतिष्ठित संस्कृत शोध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है।
फैमिली का रोल क्या है ?
मेरी वाइफ वनमाला अंग्रेजी की लेक्चरर है, पर संस्कृत के प्रचार प्रसार और अन्य कार्यों में मेरी बहुत मदद करती है। शादी के बाद उन्होंने मुझसे संस्कृत सीखी। मेरी दोनों बेटियां अंग्रेजी माध्यम स्कूल में है। उन्होंने वैकल्पिक विषय संस्कृत लिया है। वो आसानी से संस्कृत में बात कर लेती हैं।
निशुल्क अध्यापन ?
मैं प्रतिदिन सुबह 6 बजे से 9 बजे तक विद्यार्थियों को निशुल्क पढाता हूं। 8 साल से मैं निशुल्क अध्यापन कर रहा हूं। इसके अलावा काशी की गुरूकुल परंपरा मानसरोवर में भी बनाई हुई है। गुरूकल में विद्यार्थी परंपरागत गुरूकुल शिक्षा के अनुरूप रहते हैं व संस्कृत का अध्ययन करते है।
संस्कृत से जोडऩे के लिए इंटरनेट का उपयोग करते है ?
इंटरनेट के युग में किसी भी भाषा के विस्तार के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध्ता होनी जरूरी हैं। मेरे विद्यार्थी देश के अलग अलग हिस्सों से है, जिन्हें मैं इंटरनेट व दूरभाष के माध्यम से संस्कृत सीखाता हूं। इसके साथ ही मैं ऐसी तकनीक भी बनाने के प्रयास में हूं, जिससे सोशल साइटस के माध्यम से सरल सूत्रों से लोग संस्कृत को सीख सके। नवीन प्रयास से संस्कृत का सरल रूप इंटरनेट पर उपलबध हो जाएगा।
मातृभाषा के लिए संदेश ?
संस्कृत बहुत ही मधुर भाषा है, जो प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश देती है। हर रोज या सप्ताह में कम से कम एक बार तो संस्कृत अवश्य पढऩी चाहिए। किसी भी व्यक्ति से आप जो भी अच्छी बात सीख सकते हैं जरूर सीखें।
राष्ट्रपति से मुलाकात कैसी रही ?
जब मेरा नाम पुकारा गया और मैं उनके समीप पहुंचा तो उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया। उन्होंने कहा बहुत अच्छा। यह पल जिन्दगी का सबसे यादगार पल है।
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